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थार में आई पीलू की बहार, सेहत के लिए फायदेमंद
बङे बुजुर्गों का कहना है कि तेज गर्मी और लू के दौरान पकने वाले रसीले फल पीलू के सेवन से लू नही लगती है। वहीं पौष्टिक तत्व भी मिलते है। पीलू इकट्ठे करने के लिए जाळ के पेङ पर चढकर काफी मशक्कत करनी पङती है।
Sangri Today Verified Media or Organization • 28 Mar, 2026Editor
भंवर विश्नोई धोरीमन्ना। थार के धोरों में जहां आग उगलती गर्मी से लोग पानी के लिए तरस रहें है, वहीं इस मौसम में कैर, सांगरी के बाद मारवाङ के अंगूर के रूप में जाळों पर लाल, पीले रंग के पीलुओं की बहार आई हुई है। रोजाना अलसवेरे ही बच्चे, युवा व महिलाएं ग्रूप में पीलू लेने निकलते है। बङे बुजुर्गों का कहना है कि तेज गर्मी और लू के दौरान पकने वाले रसीले फल पीलू के सेवन से लू नही लगती है। वहीं पौष्टिक तत्व भी मिलते है। पीलू इकट्ठे करने के लिए जाळ के पेङ पर चढकर काफी मशक्कत करनी पङती है। कमर या गले में पतली रस्सी से लोटा बांधकर एक-एक कर पीलू बिनकर लोटा भरते है। घंटो मेहनत के बाद बङा पात्र बाल्टी, छबङी या चरूङी पीलुओं से भर पाते है। इसे खाने के लिए भी पूरी सावधानी रखनी पङती है। इसकी गुट्ठली खारी होती है। खाते समय टूट जाने से पूरा स्वाद खारा हो जाता है। इतना ही नहीं एक-एक कर खाने पर भी मुंह छालों से भर जाता है। इन्हें मुट्ठीभर कर खाया जाता है।
पर्यावरण कार्यकर्त्ता भेराराम भाखर बताते है कि पीलू खाने से कई रोग ठीक हो जाते है। ग्रामीण लोग पीलू सुखाकर कोकङ बनाते है और 12 माह औषधी के रूप में रखते है। कोकङ गर्मी, लू, हैजे व कब्ज से बचाव के लिए रामबाण औषधी है। इस बार पीलू आवक के चलते रेडाणा, जायङू रण क्षेत्र, भाचभर, इन्द्रोई ओरण, किराङू पहाङ, भूणिया, कितनोरिया, गुमानतला धोरों में अलसवेरे ही ग्रामीणों के झुंड पीलू लाने के लिए निकल पङते है। यह बाजार में 50 रूपए प्रति लोटा के हिसाब से बिक रहे है। बङे रसीले पीलुओं के रस से कई जानकार लोग सब्जी भी बनाते है जो स्वादिष्ट और गुणकारी होती है। वैसे जाळ का पेङ मरुस्थलीय क्षेत्र में कम पानी मे भी घना फैला होने से इसकी गहरी छाया आमजन, वन्यजीव और पशु-पक्षिओं के लिए आरामदेह होती है। इसकी पत्तियाँ पशुओं के चारे के काम आती है। मरुस्थलीकरण रोकथाम में जाळ का पेङ बहुपयोगी है। रेगिस्तान में जाळ का पेङ दीर्घकालीन व मजबूती वाला होता है।
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