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540 वां बिश्नोई धर्म स्थापना दिवस: बिश्नोई समाज के लिए 29 नियम जीवन जीने की कला - डॉ मधु बिश्नोई
आज से 540 वर्ष पूर्व संवत 1542 कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को पश्चिमी राजस्थान के समराथल नामक स्थान पर गुरु जम्भेश्वर भगवान ने 29 नियमों की आचार संहिता का पालन करने वाले बिश्नोई समाज की स्थापना की ।
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540 वां बिश्नोई धर्म स्थापना दिवस: बिश्नोई समाज के लिए 29 नियम जीवन जीने की कला - डॉ मधु बिश्नोई
आज से 540 वर्ष पूर्व संवत 1542 कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को पश्चिमी राजस्थान के समराथल नामक स्थान पर गुरु जम्भेश्वर भगवान ने 29 नियमों की आचार संहिता का पालन करने वाले बिश्नोई समाज की स्थापना की ।
Full Story: https://hindi.sangritoday.com/29-rules-of-living-for-bishnoi-society-dr-madhu-bishnoi
बिश्नोई समाज के लिए 29 नियम जीवन जीने की कला : डॉ मधु बिश्नोई
आज से 540 वर्ष पूर्व संवत 1542 कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को पश्चिमी राजस्थान के समराथल नामक स्थान पर गुरु जम्भेश्वर भगवान ने 29 नियमों की आचार संहिता का पालन करने वाले बिश्नोई समाज की स्थापना की । बिश्नोई समाज, भारत के पश्चिमी थार रेगिस्तान और आसपास के क्षेत्रों में निवास करने वाला एक प्राचीन समुदाय है। यह समुदाय अपने अद्वितीय पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांतों और जीव-जंतुओं के प्रति गहरे प्रेम के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। उन्होंने 29 सिद्धांतों का प्रतिपादन किया, जिनमें पेड़ों और जीव-जंतुओं की रक्षा करना सबसे महत्वपूर्ण था।
गुरु जंभेश्वर जी ने अपने उपदेशों के माध्यम से समाज को प्रकृति के साथ सद्भावपूर्ण जीवन जीने का मार्ग दिखाया। उन्होंने पेड़ों को काटना और जीव-जंतुओं को मारना पाप बताया। इनके उपदेशों ने समाज में एक क्रांति ला दी और लोगों को प्रकृति के प्रति जागरूक किया। बिश्नोई समाज के लोग पेड़ों को माता का दर्जा देते हैं और उनकी रक्षा के लिए अपना जीवन तक न्योछावर करने को तैयार रहते हैं।
खेजड़ली बलिदान बिश्नोई समाज के बलिदान का सबसे बड़ा उदाहरण है। 1730 में जोधपुर के पास खेजड़ली गांव में जोधपुर के महाराजा के आदेश पर पेड़ों को काटा जा रहा था। अमृता देवी बिश्नोई ने पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। उनके इस बलिदान ने पूरे विश्व में प्रकृति संरक्षण के लिए एक प्रेरणा का काम किया। बिश्नोई समाज के लोग न केवल पेड़ों बल्कि सभी जीव-जंतुओं के प्रति भी अत्यंत करुणा रखते हैं। वे किसी भी जीव को हानि पहुंचाना पाप मानते हैं। बिश्नोई समाज के लोग शिकार नहीं करते और न ही मांसाहारी भोजन करते हैं। वे जीव-जंतुओं को अपने घरों में पालते हैं और उनकी देखभाल करते हैं।
बिश्नोई समाज के लोग सामाजिक समरसता में भी विश्वास रखते हैं। वे सभी धर्मों और जातियों के लोगों के साथ सद्भावपूर्ण संबंध रखते हैं। बिश्नोई समाज के लोग शिक्षा और सामाजिक सुधार के लिए भी प्रयासरत रहते हैं। आज भी बिश्नोई समाज प्रकृति संरक्षण के लिए अग्रणी भूमिका निभा रहा है। वे वन्यजीव अभयारण्यों और पक्षी अभयारण्यों की रक्षा करते हैं और लोगों को प्रकृति के प्रति जागरूक करते हैं। बिश्नोई समाज के लोग अपने गांवों में वृक्षारोपण करते हैं और जल संरक्षण के उपाय करते हैं।
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बिश्नोई समाज का इतिहास और उनकी जीवनशैली हमें प्रकृति के प्रति हमारे कर्तव्यों की याद दिलाती है। हमें भी गुरु जंभेश्वर जी के आदर्शों को अपनाना चाहिए और प्रकृति के साथ सद्भावपूर्ण जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। बिश्नोई समाज का यह संदेश आज भी प्रासंगिक है, जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय प्रदूषण जैसी समस्याओं से जूझ रही है।
बिश्नोई समाज हमें सिखाता है कि प्रकृति हमारा सबसे बड़ा उपहार है और हमें इसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। आइए हम सभी मिलकर बिश्नोई समाज के आदर्शों को अपनाएं और एक स्वच्छ और हरा-भरा पर्यावरण बनाने में अपना योगदान दें।
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