ये विचार महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्विद्यालय के कुलपति डॉ. अजीत कुमार कर्नाटक ने विश्वविद्यालय के संघटक सामुदायिक एवं व्यावहारिक विज्ञान महाविद्यालय के मानव विकास एवं पारिवारिक अध्ययन विभाग की प्रोफेसर डॉ. गायत्री तिवारी द्वारा लिखित पुस्तक मनन :मन की गरिमा तक के लोकार्पण समारोह में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किये .आपने कहा की जीवन के अनुभवों को जीना और फिर उन्हें मस्तिष्क पटल के रास्ते से मनन चिंतन करते हुए सशक्त लेखनी द्वारा जनमानस के ह्रदय पटल पर अंकित करना एक बिरली विधा है .बसंतपंचमी जैसे पावन दिन पर माँ सरस्वती की अनुकम्पा से पुस्तक विमोचन समान पुनीत कार्य को करना आपने अपना सौभाग्य बताया.आपने लेखिका को बधाइयां प्रेषित करते हुए भविष्य में भी इस प्रकार के लेखन को जारी रखने का आह्वाहन किया .
कार्यक्रम के आयोजक और विशिष्ट अतिथि डॉ . इंद्रप्रकाश श्रीमाली ,अध्यक्ष -प्रसंग संस्थान और पूर्व निदेशक -आकाशवाणी उदयपुर ने लेखन और लेखिका की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए कहा की ये कृति मानवीय मूल्यों को परिलक्षित करती है।वर्तमान में जब सारा विश्व मोबाइल की चपेट में है ,ऐसे में अच्छा साहित्य ही समाज को सही दिशा देकर दशा सुधारने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। पुस्तक परिकल्पना प्रस्तुत करते हुए लेखिका डॉ .गायत्री तिवारी ने स्वयं के माता पिता को नमन करते हुए उनकी परवरिश के दौरान हुए बीजारोपण को सृजन का मूलाधार बताया। आपने कहा की अभिभावकों और परिवारजनों द्वारा दी गई शिक्षा "जीवन को सहजता से जीना तथा सभी रिश्तों में अंत तक संभावना तलाशना " को ह्रदय में धड़कन की तरह बसाया है। आप निर्जीव चीज़ों में भी अहसासों की परिकल्पना कर लेती हैं और ये मान के चलती हैं की चाहे लोगों ने उन्हें पतझड़ थमाया हो ,लेकिन उन्होंने बसंत लौटाया है।
डॉ. मधु अग्रवाल -पूर्व विभागाध्यक्ष , व्यावसायिक प्रशासन कॉलेज शिक्षा ,वरिष्ठ कवियित्री ने कहा की लेखिका की लेखनी की धार इसलिए पैनी है की वे कथनी और करनी में अंतर् नहीं रखती और रिश्तों की गहराइयों को समझते हुए मानवीय मूल्यों की सशक्त पैरोकार भी हैं। सरोज कर्नाटक ने अपने विशिष्ट अतिथि उद्बोधन में शब्द को ही घाव और शब्द को ही मरहम बताया और लेखिका को सम्पूर्ण पुस्तक को ऑडियो रूप में तैयार करने की मंशा ज़ाहिर की ताकि अधिकाधिक लोगों तक इसकी सुगमता हो सके।
समीक्षा करते हुए ख्यातनाम वरिष्ठ अधिवक्ता रागिनी शर्मा ने कहा की इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता है लेखिका द्वारा कोरोना काल के दौरान ऐसा सकारात्मक चिंतन जब चहुँ ओर जनमानस नकारात्मकता से लिपटा हुआ था। ये ऐसा अनूठा लेखन है जिसमें हमारे आस पास की निर्जीव वस्तुओं यथा कबाड़ ,सड़क ,तार ,फ़ोन ,सीढ़ी जे. सी. बी.,तराजू ,मोमबत्ती ,अलमारी ,चमचे ,सुई इत्यादि को केंद्र मान कर उसे मानवीय रिश्तों से जोड़ा गया है। पाठक, पुस्तक के 962 पेज देख कर घबरा सकता है किंतु एकाध पेज पढ़ कर पढ़ना नहीं छोड़ेगा। डॉ कुंजन आचार्य ,विभागाध्यक्ष ,जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग ,मोल्हनलाल सुखदिआ विश्वविद्यालय ,उदयपुर ने समीक्षा करते हुए पुस्तक को अनुभवों की पाठशाला बताया और लेखिका के नाम के साथ जोड़ते हुए उसे गायत्री पुराण का नाम दिया। आपने पुस्तक का नाम लेखिका के पुत्र और पुत्रवधु के नाम पर रखने को विशेष रूप से रेखांकित किया साथ ही सहज ,सरल और प्रवाहमान भाषा और विचार प्रवाह को पुस्तक के प्रभावी होने का आधार बताया। इसी भांति डॉ देवेंद्र शर्मा ,एसोसिएट एडिटर न्यूज़ -18 राजस्थान ने भी अपनी समीक्षा में पुस्तक को जिंदगी और हर उम्र के रिश्ते को बयान करती ,जनेरेशन गेप तथा अपनेपन की गर्माहट को समझती हुई अनुभवाधारित अनमोल धरहोर बताया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विशेषाधिकारी और पूर्व प्रोफेसर डॉ. वीरेंद्र कुमार नेपालिया द्वारा जयपुर की ख्यातनाम लेखिका डॉ कमलेश माथुर द्वारा भेजी गई टिप्पणी का वाचन किया गया। जिसमें आपश्री ने पुस्तक को एक धार्मिक ग्रन्थ बताते हुए पुस्तक के बारे में बताने में स्वयं को असमर्थ मानते हुए लिखा की "गूंगा गुड़ खाकर क्या बोलेगा?"
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. मंजु चतुर्वेदी ,संरक्षिका -प्रसंग संस्थान ,पूर्व प्राचार्य -कॉलेज शिक्षा एवं वरिष्ठ कवियित्री ने समवेत स्वर में स्वर मिलते हुए पुस्तक को अद्वितीय ,अनुकरणीय, अनुसरणीय और संग्रहणीय बताया। आपने कहा की पुराने ज़माने में जिस प्रकार किस्सागोई की शैली होती थी ,जिसमें बातों में से बातें निकलती चली जाती थीं और सुनने वाला कहाँ से कहाँ पहुँच जाया करता था ,ठीक उसी प्रकार पुस्तक के छोटे छोटे लेखों में पाठक अक्षरों का हाथ पकड़ कर ना जाने कहाँ –कहाँ का सफ़र कर लेता है .लेखिका को असीम बधाईयां प्रेषित करते हुए भविष्य में इस तरह की पुनरावर्ती की इच्छा जताई। धन्यवाद ज्ञापित करते हुए लेखिका के भ्राता और प्रकाशक डॉ. कैलाश बृजवासी ,संस्थापक -जतन संस्थान ,उदयपुर ने कहा की लेखनी इतनी ज़्यादा परिपक्व और सारगर्भित थी की केवल प्रकाशन द्वारा ही इसे संजोया जा सकता था। इस पुस्तक का इस्तेमाल जीवन कौशल संबंधी प्रशिक्षण में अनेवारी रूप से किया जाना चाहिए .स्वजनों के विचारों को पंख देकर ना केवल हम उन्हें उड़ान देते हैं अपितु परिवार का नाम रोशन करने में स्वयं की भागीदारी भी सुनिश्चित करते हैं। समारोह में डॉ. सुमन भटनागर,डॉ. हेमू राठौड़ ,डॉ. स्नेहा जैन सहित शहर के ख्यातनाम पदाधिकारी और साहित्यानुरागी मौजूद थे।
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