रेटिंग: 3/5

फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी सात साल के बच्चे मोमोजी की है, जो अपने माता-पिता और दादा-दादी के बीच फंसा हुआ है। जब वह तीन महीने का था, तो उसकी तबियत ख़राब होने के बाद उसे उसकी दादी मुंबई से पंचगनी ले आयी थी क्योंकि उसके माता-पिता वर्किंग हैं ऐसे में पीछे साढ़े छह सालों से दादी और दादा ही उसकी देखभाल कर रहे हैं। उसके माता-पिता वीकेंड पर उससे मिलने आते हैं लेकिन वह अब मोमोजी को अपने साथ मुंबई में रखना चाहते हैं, लेकिन उनकी हिम्मत नहीं है कि वह यह बात मोमोजी के दादा को कह सकें क्योंकि दादा का मानना है कि बच्चे को इंसान बनाने के लिए पेरेंट्स के समय की सबसे अधिक ज़रूरत होती है, जो वर्किंग कपल के पास नहीं है। इसके साथ ही दादा अपने बेटे को निक्कमा समझता है। ऐसे ही सबकुछ चल रहा होता है कि अचानक मोमोजी के पिता को अमेरिका में एक बहुत अच्छे जॉब का ऑफर मिल जाता है। वह अब मोमोजी को लेकर अमेरिका जाने का फैसला कर लेते हैं लेकिन दादा इसके लिए तैयार नहीं है। वह पोते की कस्टडी के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं। बच्चे को अपने पास रखने का नैतिक दावा किसके पास है? अदालत का फैसला क्या होगा और मोमोजी आखिर क्या चाहता है? यह फिल्म इसी सवालों के आगे जवाब देती है।

फिल्म की खूबियां

  • फिल्म पैरेंटहुड की जिम्मेदारियों और मौजूदा दौर में उससे जुडी जटिलताओं को बखूबी रेखांकित करती है।
  • फिल्म के हर किरदार को आम इंसान की तरह दिखाया है। कोई भी परफेक्ट नहीं है। बेटे के किरदार में कमज़ोरियां हैं तो दादा के किरदार का अख्खड़पन भी अखरता है और पोते को अपने साथ रखने के उसके स्वार्थ को भी फिल्म दिखाती है।
  • फिल्म का गीत संगीत कहानी के अनुरूप है।
  • फिल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है, जो फिल्म में सुकून का रंग जोड़ती है।

फिल्म की खामियां

  • फिल्म की मूल कहानी कमोबेश नयी नहीं है। दादा दादी और पोते के बीच लगाव पर अब तक कई फिल्में बन चुकी हैं।
  • कोर्टरूम में और ड्रामा की उम्मीद थी लेकिन फिल्म उस मामले में कमज़ोर रह गयी है।
  • शिव पंडित का किरदार आखिर क्यों अपने घर को छोड़कर चला गया था? फिल्म में इसका भी जिक्र मात्र ही हुआ है।
  • फिल्म का सेकेंड हाफ स्लो भी रह गया है।

कलाकारों का प्रदर्शन

  • परेश रावल, नीना कुलकर्णी, अमृता सुभाष, मनोज जोशी जैसे दिग्गज कलाकारों ने अपने किरदारों को बखूबी निभाया है।
  • शिव पंडित का अभिनय अच्छा है, इमोशनल दृश्यों में वह कमज़ोर ज़रूर रह गए हैं।
  • मिमी चक्रवर्ती अपनी पहली हिंदी फिल्म में भी प्रभावित करने में कामयाब रही हैं।
  • मोमोजी के किरदार में कबीर पाहवा बहुत प्यारे लगे हैं।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, शास्त्री विरुद्ध शास्त्री एक अच्छी पारिवारिक फिल्म है जो पैरेंटहुड के मुद्दे को उठाती है। फिल्म में कलाकारों का प्रदर्शन अच्छा है और निर्देशन भी ठीक है। हालांकि, फिल्म की कहानी कुछ हद तक पुरानी हो चुकी है और फिल्म का दूसरा भाग कुछ धीमा है। फिर भी, अगर आप एक अच्छी पारिवारिक फिल्म देखना चाहते हैं तो यह फिल्म एक अच्छा विकल्प है।