Key Highlights
- 'धुरंधर द रिवेंज' 229 मिनट की अत्यधिक लंबी फिल्म है, जो दर्शकों को थका देती है।
- रणवीर सिंह का दमदार अभिनय भी फिल्म की बिखरी हुई पटकथा को नहीं बचा पाता।
- अत्यधिक स्टाइलिश हिंसा और शोरगुल कहानी की गहराई और किरदारों के विकास पर हावी होते हैं।
धुरंधर द रिवेंज: उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी
आदित्य धर निर्देशित फिल्म 'धुरंधर द रिवेंज' अपनी मूल फिल्म से बेहतर होने का दावा करती है, लेकिन यह एक बोझिल और थका देने वाला अनुभव साबित होती है। 229 मिनट की यह रिवेंज ड्रामा सिर्फ जोर-जोर से चिल्लाने और स्टाइल पर ध्यान केंद्रित करती है, जबकि कहानी में गहराई का अभाव स्पष्ट दिखता है। निर्देशक ने फिल्म की लंबाई को ही अंतर्दृष्टि और गहनता का पैमाना मान लिया, जो इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभरी है।
रणवीर सिंह का प्रयास, पर कहानी का बिखराव
यह फिल्म वहीं से शुरू होती है जहाँ पहली किस्त खत्म हुई थी। रणवीर सिंह, जस्कीरत सिंह रंगी (उर्फ हमजा अली मजारी) के रूप में, कराची के आपराधिक संसार में अपना रास्ता बनाने के लिए हिंसा और जोड़तोड़ का सहारा लेते हैं। एक रोमांचक जासूसी थ्रिलर का आधार होने के बावजूद, कहानी जल्द ही पूरी तरह से अराजकता में बदल जाती है। गैंगवार, राजनीतिक साजिशें और लगातार खून-खराबा कहानी को इतना उलझा देते हैं कि दर्शक भावनात्मक रूप से इससे जुड़ नहीं पाते और न ही कोई सुसंगति ढूंढ पाते हैं।
फिल्म में कई खामियां होने के बावजूद, रणवीर सिंह ने अपने किरदार के गुस्से और नाजुकता के द्वंद्व को बखूबी निभाया है। उन्होंने फिल्म को कुछ हद तक स्थिर रखने की पूरी कोशिश की, लेकिन जब किसी फिल्म में शुरुआत से ही दिशा का अभाव हो, तो किसी भी कलाकार के लिए उसे अपनी रचनात्मक प्रतिभा से बचाना मुश्किल हो जाता है। दुर्भाग्य से, रणवीर सिंह एक ऐसी पटकथा में जान नहीं फूंक पाते जो किसी वेब सीरीज के बेतरतीब एपिसोड्स के संग्रह जैसी लगती है, बजाय इसके कि वह एक सुसंगत सिनेमाई कृति हो।
अत्यधिक स्टाइल और सतही किरदार
निर्देशक आदित्य धर अपनी एक्शन फिल्मों में अविश्वसनीय रूप से स्टाइलिश हिंसा और शोरगुल भरे, तेज-तर्रार एक्शन दृश्यों का प्रयोग करते हैं। 'धुरंधर द रिवेंज' में ये दृश्य दर्शकों का ध्यान भटकाने का काम करते हैं, बजाय इसके कि वे फिल्म के मूल विषय को सहारा दें। धमाके और ग्राफिक हिंसक छवियां फिल्म में किरदारों के विकास पर हावी हो जाती हैं। संजय दत्त, अर्जुन रामपाल और आर. माधवन जैसे सहायक कलाकार भी अपनी एक आयामी प्रस्तुति के कारण कहानी के समग्र विकास में कोई योगदान नहीं दे पाते।
लंबी अवधि और दर्शकों की घटती रुचि
इस फिल्म की एक बड़ी कमी इसकी बहुत लंबी अवधि है। अधिकांश दृश्यों की लंबी लंबाई हर सीन की गति को धीमा कर देती है, जिससे दर्शकों की कहानी से जुड़े रहने की क्षमता भी प्रभावित होती है। 'धुरंधर द रिवेंज' अत्यधिक फिल्म निर्माण की विफलता का एक और उदाहरण है। फिल्म में कई आकर्षक दृश्य हैं, लेकिन दर्शकों को बांधे रखने के लिए इसमें एक सुविकसित कहानी का अभाव है।
जो दर्शक केवल तेज और रोमांचक फिल्में पसंद करते हैं, उन्हें शायद यह फिल्म निराश न करे। लेकिन जो लोग स्मार्ट, सारगर्भित और सुविकसित कहानियों वाली फिल्मों की तलाश में हैं, उन्हें यह फिल्म अपने समय के लायक नहीं लगेगी। फिल्म जगत की ऐसी ही और गहन समीक्षाओं के लिए संगरी टुडे हिंदी से जुड़े रहें।