पारंपरिक जलाशयों को नया जीवन देने के लिये एटीई चंद्रा फाउंडेशन के साथ सहयोग किया

अंबुजा सीमेंट फाउंडेशन ने राजस्थान के पाली जिले में पारंपरिक जलाशयों को नया जीवन देने के लिये एटीई चंद्रा फाउंडेशन के साथ सहयोग किया

यह पहल महाराष्‍ट्र के चंद्रपुर जिले में भी की गई है

पारंपरिक जलाशयों को नया जीवन देने पर ध्‍यान

जल के भंडारण हेतु 166 मिलियन लीटर की अतिरिक्‍त क्षमता मिलेगी

अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड की कॉर्पोरेट सामाजिक उत्‍तरदायित्‍व (सीएसआर) शाखा अंबुजा सीमेंट फाउंडेशन (एसीएफ) ने एटीई चंद्रा फाउंडेशन के साथ साझेदारी की है। इस सहयोग के तहत एसीएफ ने महाराष्‍ट्र में सूखे को लेकर संवेदनशील चंद्रपुर जिले और राजस्‍थान के पाली जिले में पारंपरिक जलाशयों को नया जीवन देने के प्रयास किये हैं।

दोनों जिलों के 50 गाँवों में सामुदायिक तालाबों का कीचड़ हटने (डिसिल्टिंग) से जल के भंडारण हेतु 166 मिलियन लीटर की अतिरिक्‍त क्षमता मिलेगी।

इस प्रयास में स्‍थानीय समुदाय की भागीदारी बड़े पैमाने पर रही है, नये किये जाने वाले जलाशयों के चयन से लेकर इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी तक। इसके अलावा, प्रोजेक्‍ट का 75% खर्च स्‍थानीय समुदाय उठा रहे हैं और उनमें से कुछ तो तालाबों की कीचड़ हटाने हेतु खुदाई के लिये मशीनें और ट्रैक्‍टर भी ला रहे हैं। इस गाद को विभिन्‍न गाँवों के विकास कार्यों के लिये आस-पास के इलाकों में पहुँचाया जा रहा है।

कुल मिलाकर चंद्रपुर और पाली की 9 ग्राम पंचायतों के 17 जलाशयों से क्रमश: 24000 क्‍युबिक मीटर और 142000 क्‍युबिक मीटर कीचड़ (सिल्‍ट) हटाया जा चुका है।

अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड के एमडी और सीईओ नीरज अखौरी ने कहा, “पृथ्‍वी पर मानव जीवन बना रहे, इसके लिये सबसे महत्‍वपूर्ण चीजों में से पानी एक है। अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड में हम यह सुनिश्चित करने पर जोर देते हैं कि इस बहुमूल्‍य संसाधन तक ग्रामीण संसाधनों की पहुँच बनी रहे। भारत में पानी के अभाव वाले क्षेत्रों में ऐसे प्रयास, स्‍थानीय समुदायों की मूलभूत आवश्‍यकताओं में सहयोग देने के हमारे स्‍थायी प्रयास दिखाते हैं।”

डिसिल्टिंग के प्रयासों से आस-पास के क्षेत्रों में 550 नलकूपों में पानी का स्‍तर बढ़ा है। बाहर निकाले गए कीचड़ को मिट्टी की नमी और फसल की उत्‍पादकता के लिये बहुत फायदेमंद माना जा रहा है।

अंबुजा सीमेंट फाउंडेशन की डायरेक्‍टर और सीईओ पर्ल तिवारी ने कहा, “एसीएफ एक अभिनव एप्रोच को अपनाता है और जल के संरक्षण तथा समुदायों के लिये जलस्‍तर बढ़ाने हेतु पारंपरिक बुद्धिमानी से काम लेता है। एटीई चंद्रा के साथ हमारे काम करने से किसानों की आय पर कई प्रभाव होंगे और भूमिगत जल का रिचार्ज भी सुनिश्चित होगा।”

एटीई चंद्रा फाउंडेशन के अलावा, राबरियावास और चंद्रपुर में कई तालाबों को नया जीवन देने के लिये केयरिंग फ्रैंड्स, सज्‍जन इंडस्‍ट्रीज और अविनाश (इंदिरा फाउंडेशन) जैसी अन्‍य संस्‍थाओं ने भी मिलकर काम किया है।

जैतारण के प्रधान मेघाराम ने कहा, “एसीएफ पिछले 18 वर्षों से हमारे इलाकों में जल संरक्षण पर काम कर रहा है। एक जैसी सोच रखने वाली संस्‍थाओं और सामुदायिक सदस्‍यों की इस संयुक्‍त भागीदारी से हमने इस क्षेत्र में बड़े प्रभाव देखे हैं और स्‍थानीय समुदायों को फायदा भी मिला है।”

2000 के दशक की शुरूआत से ही एसीएफ ने जल के अभाव वाले क्षेत्रों में नये जलाशय बनाने के बजाए पहले से मौजूद जलाशयों की मरम्‍मत और मैंटेनेन्‍स को प्राथमिकता दी है। यह एप्रोच आर्थिक रूप से भी अच्‍छा है, क्‍योंकि इसमें भूमि और श्रम समेत नये स्‍ट्रक्‍चर बनाने से जुड़े खर्च नहीं होते हैं। ऐसे स्‍ट्रक्‍चर्स की लगातार निगरानी भी रखी जाती है, ताकि कीचड़ हटाने और लीकेज को रोकने के काम में सफलता मिले।

जल संरक्षण की पारंपरिक प्रणालियों को नया जीवन देना ग्रामीण भारत में जल की उपलब्‍धता के प्रबंधन का एक क्षमतावान तरीका हो सकता है। निष्क्रिय जलाशयों की पहचान और मरम्‍मत करने के लिये समान सोच रखने वाले भागीदारों और समुदायों के साथ कर्मठता से काम करने और लोगों के संस्‍थान बनाने से इन ग्रामीण समुदायों के लिये एक स्‍थायी तरीके से जल की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।



सांगरी टुडे हिंदी न्यूज़ के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और टेलीग्राम पर जुड़ें .
लेटेस्ट वीडियो के लिए हमारे YOUTUBEचैनल को विजिट करें