विश्वविख्यात लिविंग फोर्ट सोनार किला में जर्जर आशियानों से मंडरा रहा खतरा

जैसलमेर - विश्व पटल पर अपनी विशेष पहचान रखने वाला ऐतिहासिक सोनार दुर्ग जो अब फिर अपनी दुर्दशा को रोने लगा है। जर्जर मकान यहां मौत को दावत दे रहे है। सरकारी कागजात के जाल में फंसी मरम्मत कार्यो की अनुमति मिलने से पहले तो हादसे ही हो जाते है। ऐसा ही एक मामला हाल ही में सामने आया है। सोनार किले के कोठड़ी पाड़ा में बारिश के अगले दिन रिहायशी मकान की छत ढहने की घटना सामने आने के बाद एक बार फिर दुर्ग के जर्जर मकानों ने खतरे की घंटी बजा दी है। करीब साढ़े चार सौ परिवारों व साढ़े तीन हजार लोगो को आश्रय देने वाले इस किले में जिम्मेदारों की लापरवाही का ही यह नतीजा है कि इसकी नींव खोखली हो रही है, जर्जर दीवारें दरकने लगी हैं और मरम्मत के इंतजार में जीर्ण-क्षीर्ण मकान ध्वस्त हो रहे हैं। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि 99 बुर्जों वाले सैकड़ों वर्ष प्राचीन सोनार दुर्ग ने जैसलमेर शहर को राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पटल पर विशिष्ट पहचान दिलाई है। निराशाजनक बात यह है कि देश और दुनिया में रिहायशी किले के तौर पर प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके सोनार दुर्ग में पुरातत्व विभाग के नियमों तथा पिछले अर्से से जारी प्रशासन की सख्ती की वजह से दुर्ग वासियों की पीड़ा थमने का नाम ही नहीं ले रही। दुर्ग वासियों की मानें तो किले में रहने वालों को मकान निर्माण संबंधी अनुमति मांगने पर पुरातत्व विभाग की ओर से इतने तरह के कागजात मांगे जाते है,जो वे पूरे नहीं कर पाते। लोगों को बुरी तरह से परेशान किया जा रहा है।कई साल बीत जाने के बाद भी अनुमति नही दी जा रही है।

गत शुक्रवार को सोनार दुर्ग की कोठडी पाड़े में घटित हादसे को लेकर भी पीड़ित पक्ष की ओर से यही बात कही जा रही है । जिस आशियाने में सोनार दुर्ग के बाशिंदों ने जीवन का एक बड़ा हिस्सा बिताया, उसे बदहाल अवस्था में देखकर वे दु:खी है। वे घर को मजबूत बनाना चाहते हैं। लेकिन नियमों की जटिलता के चलते हुए ऐसा नहीं कर पा रहे है। गौरतलब है कि सोनार किला व उसकी 100 मीटर की परिधि के क्षेत्र में वर्ष 1993 से भारतीय पुरातत्व व सर्वेक्षण विभाग ने निर्माण कार्य पर रोक लगा रखी है। ऐतिहासिक सोनार दुर्ग में 62 मकानों को जर्जर और क्षतिग्रस्त मानते हुए नगरपरिषद जैसलमेर की ओर से संबंधित मकान मालिकों को गत फरवरी माह में नोटिस जारी किए गए थे। नोटिस में कहा गया कि उनका मकान खतरनाक व गिरने की स्थिति में है। जिससे ये मकान गिरकर आम राहगीर या पड़ोसियों को जान-माल का नुकसान पहुंचा सकता है। उधर, नगरपरिषद की ओर से जर्जर मकानों के संबंध में नोटिस जारी किए जाने के बीच हकीकत यह भी है कि खुद दुर्गवासी ही अपने घरों की जरूरी मरम्मत या क्षतिग्रस्त भाग के निर्माण के लिए अनुमति की मांग कर रहे हैं, लेकिन अनुमति नहीं मिल रही। सोनार दुर्ग तब और अब वर्ष 1155 ईस्वी में बने व आठ शताब्दियों के गवाह इस धरोहर के मनलुभावन सुनहरे पीले पत्थरों के कारण जितना महत्व है, उतनी ही प्रसिद्ध है, इसके लिविंग फोर्ट होने की भी है। माना जाता है कि यह विश्व का एकमात्र किला है जो महारावलों के सुख-सुविधा तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि जनता ने भी इसमें रहने का गौरव हासिल किया।नगरपालिका क्षेत्र के वार्ड संख्या 16 व 17 में विभक्त सोनार दुर्ग में करीब 450 परिवार भी निवास करते हैं।


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